सूबे में लम्पी वायरस अटैक कई गायों की हुई मौत पशुपालकों में हड़कंप

विभागीय स्तर पर निर्देश दिए जाने के बाद भी विभागीय स्तर पर कारवाई है शून्य पशुपालकों में भारी रोष व्याप्त

सूबे में लम्पी वायरस अटैक कई गायों की हुई मौत पशुपालकों में हड़कंप

गरीब दर्शन/ पटना - बिहार प्रदेश के कई जिलों में लम्पी वायरस अटैक से एक और जहां पशुपालकों में हड़कंप मचा हुआ है । वहीं विभागीय स्तर पर चुप्पी साधने व उपयुक्त ईलाज के अभाव में सैकड़ों की संख्या में गायों की निरंतर मौत होने से पशुपालकों में सरकार व विभागीय उदासीनता को लेकर भारी आक्रोश व्याप्त है। विभागीय अधिकारी व चिकित्सकों महज कागजी खानापूर्ति में लगे हुए हैं। सूबे के किसी भी जिले में  रोग की भयावहता को लेकर विभाग व संबंधित चिकित्सक उदासीन हैं। यहाँ बताते चलें कि उक्त वायरस बीमारी को लेकर सरकारी स्तर पर लम्पी वायरस से बचने के लिए विभाग ने राज्य की सभी सीमाओं पर अलर्ट जारी किया है। प्रदेश के बाहर से आने वाली गायों की आवाजाही पर रोक लगा दिया गया है। रोग से ग्रसित सैकड़ों गायों की मौत हो जाने के बाद विभाग गायों की बचाने के लिए तैयारियां शुरू कर दी है। विभाग ने तो 22 जिलों में अलर्ट जारी किया है। किंतु लम्पी वायरस गायों में तेजी से फैल रहा है। इस वजह से खतरनाक लंपी वायरस से पशुओं को बचाने के लिए  पशुपालन विभाग ने नेपाल से जुड़े राज्य की सीमाओं  पर अलर्ट जारी कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है की लम्पी वायरस स्क्रीन से संबंधित वायरल डिजीज है। यह रोग पॉक्सविरिडो वायरस की फैमिली का है। गायों में इसका अधिक प्रभाव होता है। यह बुखार के साथ पशुओं को स्किन पर एक गांठ बना देता है।बाद में गांठ  फुट जाता है जिस वजह से पशुओं को असहनीय दर्द महसूस होता है। मच्छर, मक्खी,जू और ततैया जैसे खून चूसने वाले कीड़ों के सीधे संपर्क और दूषित भोजन तथा पानी के माध्यम से फैलता है। इस बीमारी की विशेषता त्वचा में गाँठ का निरंतर विकास है जो जानवर के पूरे शरीर को ग्रसित कर सकती है। घाव अक्सर मुंह और ऊपरी श्वसन भाग में पाए जाते हैं। प्रणालीगत प्रभाव में पायरेक्सिया, एनोरेक्सिया और निमोनिया शामिल है। उक्त स्किन डिजीज का पहला मामला अप्रैल में गुजरात के कच्छ क्षेत्र में सामने आया था। इसमें
संक्रमित पशु को हल्का बुखार रहता है। मुंह से लार अधिक निकलती है और आंख नाक से पानी बहता है। संक्रमित पशु के दूध उत्पादन में गिरावट आ जाती है। पशु में गर्भपात का खतरा रहता है और कभी-कभी पशु की मौत भी हो जाती है। पूर्वी चंपारण के किसान संगठन से जुड़े नवल किशोर सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा है कि मेरे गांव व आसपास के गांव में दर्जनों की संख्या में पशुओं की मौत हो रही है किंतु जिला पशुपालन विभाग एवं प्रखंड पशुपालन विभाग उदासीन बना हुआ है। महज कागजी की खानापूर्ति करके विभाग को रिपोर्ट किया जा रहा है। प्रखंड में पदस्थापित चिकित्सक  सप्ताह में एक या दो रोज ही आती हैं। उन्होंने सूबे के पशुपालन मंत्री से मांग किया है कि पशुपालकों के दर्द को महसूस करते हुए वायरस के निवारण के लिए कठोर कदम उठायी जाए।